Tuesday, December 6, 2022

Chintan Shivir: आतंक की कमर तोड़ेगा सरकार का ये ‘ब्रह्मास्त्र’, देश में समान कानून और एक पुलिस वर्दी की तैयारी

Chintan Shivir: शुक्रवार को चिंतन शिविर के दूसरे दिन प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस मुद्दे को यह कह कर आगे बढ़ा दिया कि पुलिस के लिए ‘एक राष्ट्र, एक वर्दी’ पर विचार करना चाहिए। मैं यह आप सभी पर थोपने की कोशिश नहीं कर रहा, इसके बारे में आप सोचिए। यह पांच, पचास या सौ सालों में हो सकता है, लेकिन इसके बारे में विचार करना चाहिए…

दिल्ली से सटे सूरजकुंड में आयोजित ‘चिंतन शिविर’ में कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, गृह मंत्रियों, होम सेक्रेटरी, डीजीपी व अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में अप्रत्यक्ष तौर से एक बार फिर ‘समान नागरिक संहिता’ का मुद्दा उठ गया। पहले दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इशारों-इशारों में कह दिया कि देश में ‘समान कानून और व्यवस्था’ नीति आवश्यक है। अपराध डाटा का केंद्रीयकरण जरूरी है। उसी दिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी ‘समान नागरिक संहिता’ की हिमायत कर दी। उन्होंने कहा, प्रदेश में समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है।

शुक्रवार को चिंतन शिविर के दूसरे दिन प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस मुद्दे को यह कह कर आगे बढ़ा दिया कि पुलिस के लिए ‘एक राष्ट्र, एक वर्दी’ पर विचार करना चाहिए। मैं यह आप सभी पर थोपने की कोशिश नहीं कर रहा, इसके बारे में आप सोचिए। यह पांच, पचास या सौ सालों में हो सकता है, लेकिन इसके बारे में विचार करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में अपना मत बता चुकी है केंद्र सरकार

देश में ‘समान नागरिक संहिता’ को लेकर कई वर्षों से बहस हो रही है। इस मामले में राजनीतिक दलों की भिन्न राय है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में इस बाबत याचिकाएं लंबित हैं। सभी नागरिकों के लिए समान कानून यानी समान नागरिक संहिता (कॉमन सिविल कोड) पर केंद्र सरकार ने कहा, यह एक बहुत गंभीर मुद्दा है। इस पर आगे बढ़ने से पहले, इसका गहराई से अध्ययन और विचार करने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट में दिए अपने हलफनामे में सरकार ने कहा, समान नागरिक संहिता की मांग करने वाली याचिका स्वीकार करने योग्य नहीं है। कानून बनाना संसद का संप्रभु अधिकार है। बाहरी शक्ति या अथॉरिटी इस बाबत कोई विशेष कानून बनाने का आदेश नहीं दे सकती। विधायिका को कानून बनाने का आदेश नहीं दिया जा सकता। ये सब तय करना, जनप्रतिनिधियों का नीतिगत मामला है।

एक पुलिस वर्दी और कॉमन सिविल कोड का होगा फायदा

कैबिनेट सचिवालय से सेक्रेटरी सिक्योरिटी के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस एवं सीआईसी रहे यशोवर्धन आजाद कहते हैं, समान नागरिक संहिता या एक पुलिस वर्दी, इसका फायदा होगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ गलत नहीं कहा है। उन्होंने ठीक कहा है कि अपराध के डाटा का केंद्रीयकरण होना जरुरी है। अगर एक सेंट्रल सर्वर पर यह सब जानकारी रहे, तो अपराध को रोकने में बहुत मदद मिलेगी। सीसीटीएनएस भी उसी दिशा में काम करता है, लेकिन इस पर सभी राज्य उत्साह के साथ काम नहीं कर पा रहे। राज्य सरकारों को यह देखना होगा कि इसका कितना फायदा हुआ है। क्या वे जांच कार्य में इस डाटा का इस्तेमाल कर रहे हैं। मौजूदा परिस्थितियों में आतंकवाद, ड्रग्स, साइबर क्राइम व अन्य अपराधों की गहराई से जांच के लिए सारे डाटा का सेंट्रल सर्वर पर होना अनिवार्य है।

इंटरपोल की तरह डाटा सुरक्षित रहे, राज्य करें सहयोग

जिस तरह से इंटरपोल के पास अपना एक बड़ा डेटा बैंक है, ठीक उसी तरह से देश में भी अपराध को लेकर एक सेंट्रल सर्वर होना चाहिए। इसमें सभी राज्य सहयोग करें। तमिलनाडु के कोयंबटूर में कार धमाके मामले की जांच खुद मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) से कराने की सिफारिश की है। कई आरोपियों के खिलाफ गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है। ये एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत है। अमूमन एनआईए जांच का आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय जारी करता है। बता दें कि कई राज्यों ने सीबीआई को जाँच के लिए दी सहमति वापस ले ली है। इस पर केंद्र एवं राज्यों के बीच टकराव हो चुका है।

ऑल इंडिया पुलिस एक्ट को बदलना होगा

अभी तक देश में ऑल इंडिया पुलिस एक्ट 1861 चल रहा है। राज्यों ने अपने तरीके से कानून बनाए हैं। राज्य सभी अधिकार अपने पास ही रखना चाहते हैं। देश में जब तक एक एक्ट नहीं होगा, तो कोई ठोस कार्रवाई नहीं होगी। एनआईए का न्यायिक क्षेत्राअधिकार बढ़ाया गया है। उसका फायदा भी मिल रहा है। सीबीआई को उतने अधिकार नहीं मिले हैं। एक कानून का होना बेहद आवश्यक है। तभी ऐसे मामलों में सख्ती से निपटा जा सकता है। सभी राज्यों को एक राष्ट्र, एक कानून के लिए तैयार रहना चाहिए। साथ में इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि जांच एजेंसियों या पुलिस बलों की स्वायत्तता बरकरार रहे। खासतौर पर सीबीआई व ईडी जैसी संस्थाओं में ऐसे मुखिया रहें, जिनकी नीयत और कार्यशैली पर किसी को शक न हो। उन्हें अपनी विश्वसनीयता बढ़ानी होगी। हर बात के लिए संविधान या सुप्रीम कोर्ट, इस धारणा में बदलाव लाना होगा। देश में आर्मी की तर्ज पर पुलिस की भी एक ही वर्दी हो। आज पुराना भारत नहीं है। आपातकालीन संस्थाओं की यूनिफॉर्म एक हो सकती है तो पुलिस की क्यों नहीं।

पीएम मोदी ने चिंतन शिविर में क्या कहा

पीएम ने कहा, कानून व्यवस्था भले ही राज्यों का दायित्व है, लेकिन उसमें देश की एकता व अखंडता का भी ध्यान रखना है। कानून ऐसा रहे, जिससे देश की एकता का सशक्त हो। देश की तरक्की के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा। आपदा के समय जब एनडीआरएफ या एसडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंचती हैं, तो लोगों को भरोसा हो जाता है कि अब मामला संभल जाएगा। कानून व्यवस्था अब किसी एक राज्य के दायरे में सिमटी रहने वाली नहीं रह गई है। अपराधियों का दायरा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक जा पहुंचा है। दूसरे देश में बैठकर क्रिमिनल, इंटरनेट के जरिए किसी भी अपराध को अंजाम दे देते हैं। ऐसे में सभी राज्यों को एक साथ आगे बढ़ना होगा। कई बार केंद्रीय एजेंसियों को एक साथ अनेक राज्यों में जांच करनी पड़ती है।

प्रवर्तन एजेंसियों को दस कदम आगे चलना होगा

जांच एजेंसियों को दूसरे देशों में भी जाना पड़ता है। ऐसे में सभी एजेंसियों को एक दूसरे का पूर्ण सहयोग करना चाहिए। ये इलाका तुम्हारा है, ये हमारा है, ऐसा न हो। आपस में तालमेल होना चाहिए। क्राइम करने वाले का भी ग्लोबलाइजेशन हो चुका है। उससे प्रवर्तन एजेंसियों को दस कदम आगे चलना होगा। तकनीक को बजट के तराजू से न तोलें। उपलब्ध तकनीक कैसे हमें सुरक्षा प्रदान कर सकती है, इस पर ध्यान देना होगा। केंद्र ने डेढ़ हजार पुराने कानूनों को समाप्त किया है। आजादी से पहले के कानूनों की समीक्षा आज के समय के मुताबिक करें। सभी राज्य अपने यहां के कानूनों को मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार बदलने का प्रयास करें।

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