Tuesday, December 6, 2022

न घर के रहे न घाट के, यूक्रेन-रूस के बीच जंग पुतिन पर कैसे पड़ रही है भारी

रूस और यूक्रेन के बीच जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ रहा है, पुतिन की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इस युद्ध का नतीजा क्या होगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल यह जंग पुतिन पर बहुत भारी पड़ रही है।

रूस और यूक्रेन के बीच जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ रहा है, पुतिन की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इस युद्ध का नतीजा क्या होगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल यह जंग पुतिन पर बहुत भारी पड़ रही है। इस युद्ध के चलते पुतिन की हालत ‘न घर के रहे न घाट के’ जैसी हो गई है। आलम यह है कि यूक्रेन के खिलाफ पुतिन का हर दांव उलटा पड़ रहा है। इसके चलते एक तरफ रूस में उनके समर्थकों में कमी आती जा रही है। वहीं, दूसरी तरफ दुनिया में भी अब पुतिन को विश्वसनीयता के संकट का सामना करना पड़ रहा है।

लगातार घट रहे हैं सहयोगी
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक प्रस्ताव में यूक्रेन में रूस द्वारा किए गए जनमत संग्रह की निंदा की गई। इसमें पुतिन की जमकर आलोचना की गई। जनमत संग्रह के निंदा प्रस्ताव के पक्ष में 143 वोट पड़े थे, वहीं 35 इसका हिस्सा नहीं बने। वहीं रूस समेत पांच इसके विरोध में थे। अगर इस वोटिंग को संकेत माना जाए, तो रूस के सिर्फ चार दोस्त हैं, उत्तर कोरिया, सीरिया, बेलारूस और निकारागुआ। वहीं, वोटिंग में भाग न लेने वाले देशों- चीन और भारत समेत अन्य देशों ने भी पुतिन के युद्ध के बारे में अपनी बेचैनी का संकेत दे दिया। मध्य पूर्व में, जहां मास्को ने गैर-हस्तक्षेप के लिए अपने अत्यधिक संदिग्ध समर्थन के इर्द-गिर्द राजनयिक दबदबा बनाने की कोशिश की है, कतर और कुवैत दोनों – दो ऊर्जा दिग्गज – ने यूक्रेन के क्षेत्र का सम्मान करने का आह्वान किया। इसके अलावा स्वतंत्र देशों के राष्ट्रमंडल के सभी सदस्यों ने जनमत में भाग नहीं लिया, जॉर्जिया और मोल्दोवा ने अपवाद के रूप में रूस की निंदा करने के पक्ष में मतदान किया, और बेलारूस ने मॉस्को के साथ मतदान किया।

घरेलू मोर्चे पर उभर रही ऐसी तस्वीर
घरेलू मोर्चे पर, पुतिन की तस्वीर एक अलग नेता की है, जिसके लिए प्रतिद्वंद्वी गुटों को काबू में रखना मुश्किल हो रहा है। रूस के शीर्ष सैन्य नेतृत्व की हालिया आलोचनाओं में रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु और जनरल स्टाफ के प्रमुख वालेरी गेरासिमोव को निशाना बनाया गया है। मुख्य आलोचना वैगनर समूह (कथित रूप से एक निजी सैन्य कंपनी, लेकिन वास्तव में राज्य की एक सैन्य शाखा) के प्रमुख येवगेनी प्रिगोझिन और रमजान कादिरोव, वर्तमान में रूस के चेचन गणराज्य के प्रमुख हैं, पर केंद्रित है। इस तरह की आलोचनाओं ने पुतिन के लिए समस्या पैदा कर दी है। वह पहले रूस के कुलीन कैडरों के निचले स्तर, सेना, खुफिया सेवाओं और रूसी नौकरशाही के अन्य हिस्सों से आने वाली आलोचनाओं को बड़े सहज भाव से झेल रहे थे। लेकिन शोइगू रूस में पुतिन के बाद सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक है। हालांकि उन्हें बर्खास्त करने से पुतिन को एक संभावित प्रतिद्वंद्वी से छुटकारा मिल जाएगा, लेकिन यह संरक्षण और शक्ति के एक नाजुक संतुलित चक्र में भी खलल डालेगा, जो पलटकर पुतिन की ओर ही आ सकता है।

यहां से क्या होगी पुतिन की राह?
अब पुतिन के सामने खुद को सही साबित करने की चुनौती है। अपने ही बुने जाल से खुद को आजाद करने के लिए पुतिन को अब यूक्रेन में युद्ध जीतना ही होगा। या फिर कम से कम पर्याप्त रियायतें हासिल करना है, जिन्हें वह अपनी जीत के रूप में पेश कर सकें। हालांकि, इसकी ज्यादा संभावना नहीं है। एक और समस्या यह है कि यूक्रेन में पुतिन को युद्ध के मैदान में या सौदेबाजी की मेज पर एडजस्ट करने की संभावना नहीं है। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की पहले ही कह चुके हैं कि वह केवल रूस के नए राष्ट्रपति के साथ बातचीत करेंगे। वहीं, केर्च ब्रिज पर जबर्दस्त हमला, जिसे कभी-कभी पुतिन की क्रीमिया की जीत का प्रतीक कहा जाता है, पुतिन का सीधा अपमान था, जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से इसके निर्माण की देखरेख की थी। रूसी मनोबल को कमजोर करने की तुलना में, यह यूक्रेनियन के बीच इस भावना का भी प्रतीक है कि युद्ध का रुख बदल गया है।

थक चुकी है रूस की सेना
अगर युद्ध के हालात की बात करें तो यूक्रेन में रूस की सैन्य स्थिति निराशाजनक दिख रही है। उसकी सेना थक चुकी है और पीछे हट रही है। रूस के युद्ध की देखरेख के लिए सीरिया और चेचन्या में अंधाधुंध बमबारी का आदेश देने वाले जनरल-सर्गेई सुरोविकिन को नियुक्त करने का पुतिन का निर्णय उदासीन रहा है। दरअसल, यूक्रेन के रिहायशी इलाकों और बिजली उत्पादन सुविधाओं पर क्रूज मिसाइलों के बड़े हमलों की रणनीति का उलटा असर हुआ है। इसने यूक्रेन को लड़ने के लिए और ज्यादा प्रेरित कर दिया है। वहीं, विश्व स्तर पर इसे सुरोविकिन की झल्लाहट के रूप में देखा गया है। युद्ध के मैदान में जीत तो मिली नहीं और सुरोविकिन ने अब तक यूक्रेन की आबादी को निशाना बनाने के प्रयास में लगभग 40-70 करोड़ अमेरिकी डॉलर के मिसाइल दाग दिए हैं। इसमें उन शहरों को पर भी हमले  शामिल हैं, जिन्हें रूस ने कथित रूप से अपने क्षेत्र में मिला लिया था। इस तरह यह अपने इलाके और अपने लोगों पर ही हमले थे। नतीजा यह है कि अब जब तक पुतिन नाटकीय रूप से आगे बढ़ने का विकल्प नहीं चुनते, परमाणु सीमा (जो खुद जोखिम से भरा है) को पार करके, उनका एकमात्र विकल्प चेहरा बचाने का रास्ता खोजना है।

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