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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की आर्थिक विकास यात्रा को 10 वर्ष के विराम के बाद, नई ऊंचाई पर पहुंचाया

हर्ष वर्धन त्रिपाठी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब भारतीय कृषि क्षेत्र में तीन बड़े सुधारों को लागू किया तो देशभर में हंगामा मच गया। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह रही कि जिन कृषि कानूनों को लागू करने की बात आज की विपक्षी कांग्रेस से लेकर देश के सभी राजनीतिक दलों ने औपचारिक या अनौपचारिक रूप से कही थी, अचानक सभी उस कानून के विरोध में आ गए। देश में कुछ विरोधी दलों ने इतना हंगामा किया कि अच्छे-भले कृषि अर्थशास्त्री भी कहने लगे कि ऐसी तेजी से इतने बड़े कानूनों को लागू करने की क्या आवश्यकता थी। कृषि कानूनों को लागू करने और उसे वापस लेने की इस घटना से अनुमान लगाना सहज हो सकता है कि भारतवर्ष में आर्थिक सुधारों की गति धीमी क्यों रही और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव, अटल बिहारी वाजपेयी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आर्थिक सुधार के साहसिक निर्णयों के लिए जमकर प्रशंसा क्यों की जानी चाहिए!

आर्थिक विकास

शुरू हुई नई विकास यात्रा

दरअसल, स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने समाजवादी सरकार की संकल्पना के साथ आगे बढ़ना तय किया और इतने विशाल देश की विकास की योजना को सरकारी कंपनियों के इर्द-गिर्द लागू करने को सरकारी सिद्धांत के तौर पर स्थापित कर दिया। उसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गांधी आर्थिक सुधारों को आगे ले जाने के बजाय पीछे ले गईं और बैंकों को सरकारी कर दिया, लेकिन जब नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के पामुलापर्ति वेंकट नरसिम्हाराव को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का अवसर मिला तब देश की आर्थिक काया जीर्ण-शीर्ण थी। देश की व्यवस्था लाइसेंस राज के तले दबी कराह रही थी। उस समय पी.वी. नरसिम्हाराव ने एक विशाल संप्रभु राष्ट्र भारत में आर्थिक विकास की नई यात्रा शुरू की और देश से लाइसेंस राज खत्म कर दिया। उदारीकरण के साथ ही ‘सब सरकार करेगी’ वाली मानसिकता से देश को बाहर लाने के साथ ही पी.वी. नरसिम्हाराव ने देश की रेंगती अर्थव्यवस्था को ऐसा आधार दिया कि आज कठिन समय में जब विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं घिसट रही हैं तो भारत सरपट भाग रहा है।

वैश्विक बाजार के खुले द्वार

प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जब पी.वी. नरसिम्हाराव बैठे तो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर करीब 14 फीसद की महंगाई दर, 18 फीसद की कर्ज की ब्याज दर के साथ आधे भारत को गरीबी रेखा के नीचे छोड़ गए थे। वित्तीय घाटा करीब 10 फीसद था। इसको आज के संदर्भ में समझें तो तब का भारत लगभग आज के श्रीलंका जैसे हालात में था। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा 20 टन सोना बेच चुके थे और 47 टन सोना बेचने के लिए स्वीकृति दे चुके थे। ऐसे कठिन समय में 1991 में नरसिम्हाराव सरकार की औद्योगिक नीति ने 51 फीसद विदेशी निवेश का रास्ता खोलकर लाइसेंस राज खत्म कर दिया। नरसिम्हाराव की सरकार ने सिर्फ सरकार के लिए आरक्षित 18 औद्योगिक क्षेत्रों को घटाकर 8 कर दिया। नरसिम्हाराव सरकार ने बजट में टैक्स सुधारों के साथ ही कस्टम और आयात शुल्क को भी घटाने का निर्णय लिया। भारत का बाजार विश्व की कंपनियों के लिए खुल गया और मजबूरी में ही सही, लेकिन भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार का मुकाबला करने के लिए तैयार होने लगीं। यह नरसिम्हाराव सरकार की आर्थिक दूरदृष्टि और साहसिक निर्णय था कि आज भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है।

घट गई गांव-शहर की दूरी

भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के तौर पर पांच वर्ष प्रधानमंत्री पद को सुशोभित करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने पी.वी. नरसिम्हाराव के आर्थिक सुधार के निर्णयों को पूरी शक्ति के साथ आगे बढ़ाया। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में शुरू की गई स्वर्णिम चतुर्भुज योजना ने दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई को जोड़ने वाली सड़क बनाई तो उसी पर चलकर बड़ी कंपनियां बड़े शहरों से निकलकर छोटे शहरों तक पहुंच गईं। एजाज गनी, आरती गोस्वामी और विलियम केर का शोध ‘हाइवे टू सक्सेस’ बताता है , ‘हाइवे के 10 किलोमीटर के क्षेत्र में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधि और उत्पादकता तेजी से बढ़ती है। आस-पास के शहरों की कुल उत्पादकता कम से कम 50 फीसद बढ़ जाती है।’

दूरदृष्टि के धनी

टल बिहारी वाजपेयी सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में सचिव रहे एन. के. सिंह कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी में दूरदृष्टि थी और उनके लिए निर्णयों की वजह से वाजपेयी जी इतिहास में सही पक्ष में खड़े दिख रहे हैं। पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी ने कितने शानदार तरीके से सरकार चलाई थी, इसे समझने के लिए कुछ आंकड़े ध्यान में रखना जरूरी है। 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री कार्यकाल पूरा करके हटे तो देश की अर्थव्यवस्था बेहद शानदार अवस्था में थी। भारत की विकास की रफ्तार आठ फीसद से ऊपर थी। महंगाई दर चार फीसद से नीचे थी और देश में विदेशी मुद्रा भंडार भरा हुआ था। ऐसी अर्थव्यवस्था एक कवि, पत्रकार, राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को दी थी, लेकिन डा. मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री होते हुए भी आर्थिक सुधारों का कोई भी बड़ा निर्णय नहीं ले सके। विशेषकर, सरकार के कारोबार से बाहर रहने के मूल आर्थिक सुधार के निर्णय पर भी उनके कार्यकाल में विशेष ध्यान नहीं दिया जा सका।’

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