Thursday, December 1, 2022

1962 के ‘भुला दिए गए युद्ध’ को अचानक क्यों याद कर रहा चीन? बता रहा भारत की गलती

बर्फ से ढकी पहाड़ियों का इलाका होने के कारण भारत ने वहां जरूरत भर के सैनिक तैनात किए थे, जबकि चीन पूरे लाव-लश्कर के साथ जंग के मैदान में उतरा था, लिहाजा यह युद्ध भारतीय सेना के लिए एक टीस बनकर रह गया।

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद दशकों पुराना है। लेकिन 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद जब भारत ने दलाई लामा को शरण दी तो चीन ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसके चलते 20 अक्टूबर 1962 को दोनों देशों के बीच पूर्ण युद्ध शुरू हो गया। चीन की सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले शुरू किए। दुर्गम और बर्फ से ढकी पहाड़ियों का इलाका होने के कारण भारत ने वहां जरूरत भर के सैनिक तैनात किए थे, जबकि चीन पूरे लाव-लश्कर के साथ जंग के मैदान में उतरा था, लिहाजा यह युद्ध भारतीय सेना के लिए एक टीस बनकर रह गया।

चीन में इस युद्ध को भुला दिया गया था लेकिन अब इसे एक नए सिरे से याद किया जा रहा है। भारत-चीन युद्ध की 60वीं वर्षगांठ पर चीन की सेना और मीडिया एक ऐसे युद्ध पर नए सिरे से ध्यान दे रहे हैं जिसे पहले आधिकारिक चीनी सैन्य इतिहास में काफी हद तक दरकिनार कर दिया गया था। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने अपनी 95वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक प्रदर्शनी में युद्ध का प्रदर्शन किया है, साथ ही “चीन-भारत बॉर्डर सेल्फ डिफेंस काउंटरबैक पर सौ प्रश्न” शीर्षक से युद्ध का एक नया सैन्य इतिहास जारी किया है। चीन आधिकारिक तौर पर उस युद्ध को अपने कार्यों को सही ठहराने के लिए “जवाबी हमला” बताता है। 

बीजिंग के सैन्य संग्रहालय में पीएलए प्रदर्शनी, युद्ध के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराती है। चीनी प्रदर्शनी में लिखा है, “चीन और भारत ने अपने अतीत में कभी भी औपचारिक रूप से अपनी सीमाओं का सीमांकन नहीं किया है। दोनों पक्षों के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के अनुसार केवल एक पारंपरिक प्रथागत रेखा बनाई गई है। अगस्त 1959 के बाद, भारतीय सेना ने कई बार चीनी क्षेत्र पर आक्रमण किया, जिससे सशस्त्र सीमा संघर्ष हुआ।”इसमें आगे लिखा है, “अक्टूबर 1962 में, भारतीय सेना ने बड़े पैमाने पर हमला किया और चीनी सीमा रक्षा बलों को आत्मरक्षा में वापस हमला करना पड़ा। यह 33 दिनों तक चला और सेना ने अगस्त 1959 के बाद भारतीय सेना के कब्जे वाले चीनी क्षेत्र को पुनः प्राप्त कर लिया।” प्रदर्शनी में जून 2020 गलवान घाटी संघर्ष पर भी प्रकाश डाला गया है। चीनी सेना 1962 युद्ध पर नए सिरे से फोकस कर रही है। यह संबंधों में गिरावट और बढ़ते सीमा विवाद को दर्शाता है। युद्ध को कभी-कभी चीनी पर्यवेक्षकों द्वारा “भूले हुए” युद्ध के रूप बताया जाता रहा है। चीनी लोगों का मानना है कि 1962 युद्ध को जापानी कब्जे या कोरियाई युद्ध जितना अटेंशन नहीं मिला। ये युद्ध चीनी टेलीविजन नाटकों और फिल्मों का एक प्रमुख केंद्र रहे हैं।नए युद्ध इतिहास को पूर्व पीएलए जनरल झांग गुओहुआ की बेटी झांग शियाओकांग ने लिखा है। झांग गुओहुआ ने तिब्बत सैन्य क्षेत्र का नेतृत्व किया था और पूर्वी क्षेत्र में चीनी आक्रमण की योजना बनाई थी। पहली बार जनवरी में प्रकाशित हुई पुस्तक के अंश इस सप्ताह एक बार फिर लोकप्रिय चीनी वेबसाइट गुआंचा द्वारा प्रकाशित किए गए थे। इसने कहा कि युद्ध में “सैनिकों और सैन्य प्रशंसकों की पीढ़ियों की हमेशा से दिलचस्पी रही है”। मुख्य फोकस पीएलए युद्ध के दिग्गजों की कहानियों पर रहा है। जनरल झांग शियाओकांग नई किताब का फोकस हैं लेकिन इस सप्ताह की टिप्पणियों ने अन्य 1962 जनरलों पर भी प्रकाश डाला। 16 अक्टूबर के एक लेख में डिंग शेंग और पीएलए की शुरुआती आक्रामक रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया था। 

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